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Showing posts from April, 2021

हम कौन थे, क्या हो गए है, और क्या होंगे अभी (मैथलीशरण गुप्त)

हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे       ...

झांसी की रानी

सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटि तानी थी, बूढे भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी, चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुहँ हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दांनी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। कानपुर के नाना की मुहबोली बहन 'छबेली' थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी, बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी, वीर शिवाजी की गाथाएं उसको याद जबानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी  खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार, महाराष्ट्र कुल देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी। बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई...

(भजन) सत्य धर्म की राहों पर क्यों तुमने चलना छोड़ दिया।

सत्यधर्म की राहों पर क्यों तुमने चलना छोड़ दिया  परमपिता परमेश्वर से क्यों तुमने नाता तोड़ लिया सत्यधर्म की राहों पर क्यों तुमने चलना छोड़ दिया इतनी उम्र बितादि तुमने घर गृहस्थी के झमेलों में फिर भटकते सुख के खातिर नौटंकी और मेलों में इस दुनिया की चकाचौंध में सादा जीवन छोड़ दिया। सत्यधर्म की राहों पर क्यों तुमने चलना छोड़ दिया परमपिता परमेश्वर से क्यों तुमने नाता तोड़ लिया सत्यधर्म की राहों पर क्यों तुमने चलना छोड़ दिया काशी देखी मथुरा देखी सारे तीर्थ देख लिए मंदिर मस्जिद गिरजाघर देखी और गुरुद्वारे देख लिए कहीं न मन की प्यास बुझी और कहीं नहीं भगवान मिलें सत्यधर्म की राहों पर क्यों तुमने चलना छोड़ दिया परमपिता परमेश्वर से क्यों तुमने नाता तोड़ लिया सत्यधर्म की राहों पर क्यों तुमने चलना छोड़ दिया अगर चाहिए खुशियां मन की तो कुछ ऐसे काम करो दीन दुखियों की सेवा करलो और बड़ों का मान करो सत्पुरुषों की संगत में क्यों आना जाना छोड़ दिया सत्यधर्म की राहों पर क्यों तुमने चलना छोड़ दिया परमपिता परमेश्वर से क्यों तुमने नाता तोड़ लिया सत्यधर्म की राहों पर क्यों तुमने चलना छोड़ दिया जीवन श्रेष्ठ बनाना है तो तुम...

(भजन) सत्य ही आधार है प्रभु पंथ का

सत्य ही आधार है प्रभु पंथ का प्राण है साहस सदा ये मान हो सत्य ही आधार है प्रभु पंथ का हम सभी ऋषि वंश के ही वंश है नींव है प्राचीन नव निर्माण हो सत्य ही आधार है प्रभु पंथ का प्राण है साहस सदा ये मान हो सत्य ही आधार है प्रभु पंथ का ज्ञान और पुरुषार्थ है ये सत्य जीवन में उर्ध्वारोहण निरंतर नित नमनगत से (2) चिरविजय की कामना ही श्रेय पथ का मर्म है आर्ष संस्कृति की प्रतिष्ठा हम सभी का धर्म है ध्येय है पावन चरम उत्कर्ष का ह्रदय में गुंजित सदा श्रुति गान हो हम सभी ऋषि वंश के ही वंश है नींव है प्राचीन नव निर्माण हो सत्य ही आधार है प्रभु पंथ का प्राण है साहस सदा ये मान हो सत्य ही आधार है प्रभु पंथ का आचरण है ज्ञान का उत्कर्ष जीवन में आचरण की श्रेष्ठता हो हर मनुज मन में (2) आचरण बिन ज्ञान विध्वंश और अभिशाप है जैसे बिन बाती दिया निष तेज है निषताप है आचरण के बिन अधूरा ज्ञान है आचरण ही सत्य स्वाभिमान है हम सभी ऋषि वंश के ही वंश है नींव है प्राचीन नव निर्माण हो सत्य ही आधार है प्रभु पंथ का प्राण है साहस सदा ये मान हो सत्य ही आधार है प्रभु पंथ का प्रभु पंथ का प्रभु पंथ का।

(भजन) प्रभु आशीष दो हमको

प्रभु आशीष दो हमको तुम्हारे यंत्र बन जाएं, बने राही परम् पथ के तुम्हारे अंश बन जाएं, प्रभु आशीष दो हमको तुम्हारे यंत्र बन जाएं, न होवें हम कभी विचलित सदा प्रेरित तुम्ही से हो, सभी सदभाव संवाहक ऋषि के वंश बन जाएं, प्रभु आशीष दो हमको तुम्हारे यंत्र बन जाएं, न हारे हम परिस्थिति से बदल दें प्रेम से दुनिया, स समझ कर प्रेम परिभाषा तुम्हारे संत बन जाएं। प्रभु आशीष दो हमको तुम्हारे यंत्र बन जाएं, तुम्हे अनुभव करें प्रतिपल न एक पल दूर तुमसे हो, बहारों की तरह हम भी खुशी के मंत्र बन जाएं प्रभु आशीष दो हमको तुम्हारे यंत्र बन जाएं बने राही परम् पथ के तुम्हारे अंश बन जाएं प्रभु आशीष दो हमको तुम्हारे यंत्र बन जाएं।

(गीत) ओ३म् ध्वज🚩

 जयति ओ३म् ध्वज व्योम बिहारी। विश्व प्रेम प्रतिमा अति प्यारी। सत्य सुधा बरसाने वाला स्नेह लाता सरसाने वाला साम्य सुमन विकसाने वाला विश्व विमोहक भवभयहारी इसके नीचे बढे अभय मन सत्पथ पर सब धर्मधुरी जन वैदिक रवि का हो शुभ उदयन आलोकित होवें दिशि सारी इससे सारे क्लेश शमन हो दुर्मति दानव द्वेष दमन हों अति उज्जवल अति पावन मन हो प्रेम तरंग बहें सुखकारी। इसी ध्वजा के नीचे आकर ऊंच नीच का भेद भुलाकर मिले विश्व मुद मंगल गाकर पंथाई पाखंड बिसारी इसी ध्वजा को लेकर कर में भर दें वेद ज्ञान घर-घर में सुभग शांति फैले जगभर में मिटे अविद्या की अंधियारी विश्व प्रेम का पाठ पढ़ावें सत्य अहिंसा को अपनावें जग में जीवन ज्योति जगावें त्याग पूर्ण हो वृत्ति हमारी आर्य जाति का सुयश अक्षय हो आर्य ध्वजा की अविचंल जय हो आर्य जनों का ध्रुव निश्चय हो आर्य बनावे वसुधा सारी। जयति ओ३म् ध्वज व्योम बिहारी विश्व प्रेम प्रतिमा अति प्यारी।

नववर्ष( राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर)

 ये नववर्ष हमें स्वीकार नहीं, है अपना ये त्योहार नहीं। है अपनी ये तो रीत नहीं, है अपना ये व्यवहार नहीं। धरा ठिठुरती है सर्दी से, आकाश में कोहरा गहरा है। बाग बाजारों की सरहद पर, सर्द हवा का पहरा है। सूना है प्रकृति का आँगन, कुछ रंग नही, उमंग नही। हर कोई है घर में दुबका हुआ, नववर्ष का ये कोई ढंग नहीं। चंद मास अभी इंतजार करो, निज मन में तनिक विचार करो। नए साल पर नया, कुछ हो तो सही, क्यों नकल में सारी अक्ल भरी। उल्लास मंद है जन मन का, आयी है अभी बहार नहीं। ये नववर्ष हमें स्वीकार नहीं, है अपना ये त्योहार नहीं। ये धुंध कुहासा छटने दो, रातों का राज सिमटने दो। प्रकृति का रूप निखरने दो, फागुन का रंग बिखरने दो। प्रकृति दुल्हन का रूप धार, जब स्नेह सुधा बरसाएगी। शस्य श्यामला धरती माता, घर-घर खुशहाली लाएगी। तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि, नववर्ष मनाया जाएगा। आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर,  जय गान सुनाया जाएगा। युक्ति प्रमाण से स्वयंसिद्ध, नववर्ष हमारा हो प्रसिद्ध। आर्यों की कीर्ति सदा-सदा, नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा। अनमोल विरासत के धनिकों को, चाहिए कोई उधार नही। यर नववर्ष हमें स्वीकार नहीं, ...

(भजन)जहाँ ले चलोगे भगवन वहीं मैं चलूँगी

  जहाँ ले चलोगे भगवन वहीं मैं चलूंगी ।                         जहाँ नाथ रख लोगे वहीं मैं रहूंगी ।। 2 जहाँ ले चलोगे भगवन वहीं मैं चलूंगी। ये जीवन समर्पित चरण में तुम्हारे, तुम्ही मेरे सर्वस्व तुम ही प्राण प्यारे। तुम्हे छोड़कर दाता, तुम्हे छोड़ करदाता किसे मैं कहूंगी।। जहाँ ले चलोगे भगवन वहीं मैं चलूँगी। न कोई उलाहना, न कोई अर्जी करलो करालो भगवन जो है तेरी मर्जी कहना भी होगा तो कहना भी होगा तो तुम्ही से कहूंगी। जहाँ ले चलोगे भगवन वहीं मैं चलूँगी। दयानाथ दयनीय मेरी अवस्था तेरे हाथ अब मेरी सारी व्यवस्था जो तुम कहोगे मालिक वही मैं करूँगी। जहाँ चलोगे भगवन वही में चलूँगी कहना भी होगा तो तुम्ही से कहूंगी, जहाँ ले चलोगे भगवन वहीं मैं चलूँगी। जहाँ नाथ रख लोगे वहीं मैं रहूंगी।।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस द्वारा नौजवानों का आह्वान-

वह खून कहो किस मतलब का जिसमें उबाल का नाम नहीं। वह खून कहो किस मतलब का आ सके देश के काम नहीं। वह खून कहो किस मतलब का जिसमें जीवन, न रवानी है! जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं, पानी है! उस दिन लोगों ने सही-सही खून की कीमत पहचानी थी। जिस दिन सुभाष ने बर्मा में मॉंगी उनसे कुरबानी थी। बोले, "स्वतंत्रता की खातिर बलिदान तुम्हें करना होगा। तुम बहुत जी चुके जग में, लेकिन आगे मरना होगा। आज़ादी के चरणें में जो, जयमाल चढ़ाई जाएगी। वह सुनो, तुम्हारे शीशों के फूलों से गूँथी जाएगी। आजादी का संग्राम कहीं पैसे पर खेला जाता है? यह शीश कटाने का सौदा नंगे सर झेला जाता है" यूँ कहते-कहते वक्ता की आंखों में खून उतर आया! मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा दमकी उनकी रक्तिम काया! आजानु-बाहु ऊँची करके, वे बोले, "रक्त मुझे देना। इसके बदले भारत की आज़ादी तुम मुझसे लेना।" हो गई सभा में उथल-पुथल, सीने में दिल न समाते थे। स्वर इनकलाब के नारों के कोसों तक छाए जाते थे। “हम देंगे-देंगे खून” शब्द बस यही सुनाई देते थे। रण में जाने को युवक खड़े तैयार दिखाई देते थे। बोले सुभाष, "इस तरह नहीं, बातों से मतलब स...